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श्रीमद्भगवद्गीता
श्रीमद्भगवद्गीता हिन्दू धर्म का एक अत्यंत पवित्र और महान ग्रंथ है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों का वर्णन है। यह ग्रंथ जीवन के हर पहलू—धर्म, कर्म, भक्ति और मोक्ष—का मार्गदर्शन करता है। गीता के श्लोक मनुष्य को सही कर्म करने, आत्मा की शुद्धि और भगवान में आस्था रखने की प्रेरणा देते हैं।
अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग
मोक्ष संन्यास योग श्रीमद्भगवद्गीता का अठारहवाँ और अंतिम अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समस्त गीता ज्ञान का सार प्रदान करते हैं। इस अध्याय में कर्म, ज्ञान, भक्ति और संन्यास के विभिन्न पहलुओं का समन्वय करते हुए मोक्ष प्राप्ति का मार्ग स्पष्ट किया गया है। भगवान बताते हैं कि अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए, फल की आसक्ति का त्याग कर और पूर्ण समर्पण के साथ भगवान की शरण में जाने से मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता है। वे अर्जुन को सभी प्रकार के संदेह त्यागकर धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। यह अध्याय जीवन के अंतिम सत्य, आत्मसमर्पण और परम शांति की प्राप्ति का मार्ग दर्शाता है।
अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग
श्रद्धात्रय विभाग योग श्रीमद्भगवद्गीता का सत्रहवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को श्रद्धा के तीन प्रकार—सात्विक, राजसिक और तामसिक—का विस्तार से वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि मनुष्य की श्रद्धा उसके स्वभाव और गुणों के अनुसार होती है, और वही उसके कर्म, आहार, यज्ञ, तप और दान को प्रभावित करती है। इस अध्याय में यह भी समझाया गया है कि शुद्ध और सात्विक श्रद्धा ही मनुष्य को आध्यात्मिक उन्नति और परम लक्ष्य की ओर ले जाती है। भगवान ‘ॐ तत् सत्’ मंत्र का महत्व बताते हुए कर्मों को शुद्ध करने का मार्ग भी बताते हैं। यह अध्याय मनुष्य को अपनी आस्था को समझने और उसे सही दिशा में विकसित करने की प्रेरणा देता है।
अध्याय 16: दैवासुर संपद विभाग योग
दैवासुर संपद विभाग योग श्रीमद्भगवद्गीता का सोलहवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण मनुष्य के भीतर उपस्थित दैवी (सत्कर्म) और आसुरी (दुष्कर्म) गुणों का स्पष्ट वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि दैवी गुण जैसे निडरता, सत्य, अहिंसा, संयम और करुणा मनुष्य को आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष की ओर ले जाते हैं। वहीं आसुरी गुण जैसे अहंकार, क्रोध, लोभ और अज्ञान व्यक्ति को अधोगति और दुखों की ओर ले जाते हैं। इस अध्याय में भगवान यह भी समझाते हैं कि मनुष्य को शास्त्रों के अनुसार जीवन जीना चाहिए और दैवी गुणों को अपनाकर अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाना चाहिए। यह अध्याय सही और गलत के बीच अंतर समझाकर जीवन को सही दिशा देने की प्रेरणा देता है।
अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग
पुरुषोत्तम योग श्रीमद्भगवद्गीता का पंद्रहवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण संसार के मूल स्वरूप और परम पुरुष (पुरुषोत्तम) के रहस्य को समझाते हैं। इस अध्याय में संसार की तुलना एक उल्टे अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष से की गई है, जिसकी जड़ें ऊपर (परमात्मा में) और शाखाएं नीचे फैली हुई हैं। भगवान बताते हैं कि इस संसार के मोह और बंधनों को वैराग्य और ज्ञान के द्वारा काटकर ही मनुष्य परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि जीवात्मा उनका ही अंश है और सच्चा ज्ञान प्राप्त करके वह पुरुषोत्तम परमात्मा तक पहुंच सकता है। यह अध्याय आत्मा, परमात्मा और संसार के गूढ़ संबंधों को समझाकर मोक्ष का मार्ग दिखाता है।
अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग
गुणत्रय विभाग योग श्रीमद्भगवद्गीता का चौदहवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को प्रकृति के तीन मुख्य गुणों—सत्व, रज और तम—का विस्तार से वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि ये तीनों गुण मनुष्य के स्वभाव, विचार, कर्म और जीवन की दिशा को प्रभावित करते हैं। सत्व गुण शुद्धता और ज्ञान का प्रतीक है, रज गुण क्रियाशीलता और इच्छाओं को बढ़ाता है, जबकि तम गुण अज्ञान और आलस्य को उत्पन्न करता है। इस अध्याय में यह भी समझाया गया है कि मनुष्य इन गुणों से ऊपर उठकर कैसे आत्मिक शांति और मोक्ष प्राप्त कर सकता है। गुणत्रय विभाग योग व्यक्ति को अपने स्वभाव को समझने और आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग दिखाता है।
अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग
क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग श्रीमद्भगवद्गीता का तेरहवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को शरीर (क्षेत्र) और आत्मा (क्षेत्रज्ञ) के बीच के अंतर को गहराई से समझाते हैं। वे बताते हैं कि यह शरीर एक क्षेत्र की तरह है, जिसमें विभिन्न विकार और परिवर्तन होते हैं, जबकि आत्मा उस क्षेत्र का ज्ञाता है और सदा अचल एवं शुद्ध रहती है। इस अध्याय में प्रकृति और पुरुष के संबंध, ज्ञान के तत्व और अज्ञान के प्रभाव का भी विस्तार से वर्णन किया गया है। भगवान यह स्पष्ट करते हैं कि सच्चा ज्ञान वही है, जो मनुष्य को आत्मा और परमात्मा के वास्तविक स्वरूप को समझने में सहायता करता है, जिससे वह मोक्ष की ओर अग्रसर होता है।
अध्याय 12: भक्ति योग
भक्ति योग श्रीमद्भगवद्गीता का बारहवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को सच्ची भक्ति के स्वरूप और उसके महत्व का ज्ञान देते हैं। वे बताते हैं कि जो भक्त प्रेम, श्रद्धा और पूर्ण समर्पण के साथ भगवान की उपासना करता है, वही उन्हें अत्यंत प्रिय होता है। इस अध्याय में सगुण और निर्गुण भक्ति के बीच अंतर भी समझाया गया है, साथ ही यह भी बताया गया है कि सरल और निष्कपट भक्ति मार्ग सबसे सहज और प्रभावशाली है। भगवान भक्त के गुणों—जैसे अहंकार रहित होना, सभी के प्रति समान भाव रखना और क्षमा का भाव—का वर्णन करते हैं। भक्ति योग मनुष्य को ईश्वर से जुड़ने और आंतरिक शांति प्राप्त करने का सरल मार्ग दिखाता है।
अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग
विश्वरूप दर्शन योग श्रीमद्भगवद्गीता का ग्यारहवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपना विराट और दिव्य विश्वरूप दिखाते हैं। अर्जुन भगवान से अनुरोध करते हैं कि वे उन्हें अपने उस स्वरूप का दर्शन कराएं, जिसके माध्यम से वे सम्पूर्ण सृष्टि को एक साथ देख सकें। भगवान दिव्य दृष्टि प्रदान कर अर्जुन को अनंत मुखों, नेत्रों, अद्भुत तेज और असंख्य रूपों से युक्त अपना विश्वरूप दिखाते हैं। इस अध्याय में यह स्पष्ट होता है कि भगवान ही सृष्टि के रचयिता, पालनकर्ता और संहारकर्ता हैं। विश्वरूप दर्शन योग मनुष्य को ईश्वर की अनंत शक्ति, व्यापकता और महिमा का अनुभव कराता है, जिससे उसके भीतर गहरी श्रद्धा और समर्पण की भावना उत्पन्न होती है।
अध्याय 10: विभूति योग
विभूति योग श्रीमद्भगवद्गीता का दसवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी दिव्य विभूतियों और महान शक्तियों का विस्तार से वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि इस संसार में जो भी श्रेष्ठ, अद्भुत और शक्तिशाली है, वह उनकी ही शक्ति का अंश है। इस अध्याय में भगवान अपनी उपस्थिति को प्रकृति, देवताओं, ऋषियों, पर्वतों, नदियों और विभिन्न तत्वों में प्रकट करते हैं। इसका उद्देश्य अर्जुन को यह समझाना है कि ईश्वर हर जगह विद्यमान हैं। विभूति योग मनुष्य को ईश्वर की सर्वव्यापकता का अनुभव कराने और उनके प्रति श्रद्धा एवं भक्ति को मजबूत करने का मार्ग दिखाता है।
अध्याय 9: राज विद्या राज गुह्य योग
राज विद्या राज गुह्य योग श्रीमद्भगवद्गीता का नौवाँ अध्याय है, जिसे सबसे श्रेष्ठ और गूढ़ ज्ञान का अध्याय माना जाता है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को भक्ति के सरल और प्रभावशाली मार्ग का उपदेश देते हैं। वे बताते हैं कि यह ज्ञान अत्यंत पवित्र, रहस्यमय और सभी विद्याओं का राजा है। इस अध्याय में भगवान अपनी सर्वव्यापकता, सृष्टि के संचालन में अपनी भूमिका और भक्तों के प्रति अपने प्रेम को स्पष्ट करते हैं। भगवान कहते हैं कि जो व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास के साथ उनकी भक्ति करता है, वह उन्हें सहज ही प्राप्त कर सकता है। यह अध्याय भक्ति, विश्वास और समर्पण के महत्व को गहराई से समझाता है।
अध्याय 8: अक्षर ब्रह्म योग
अक्षर ब्रह्म योग श्रीमद्भगवद्गीता का आठवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को ब्रह्म, आत्मा, कर्म और मृत्यु के समय स्मरण के महत्व का गूढ़ ज्ञान प्रदान करते हैं। वे बताते हैं कि जो व्यक्ति अंतिम समय में भगवान का स्मरण करता है, वह निश्चित रूप से उन्हें प्राप्त करता है। इस अध्याय में जीवन और मृत्यु के रहस्य, संसार के चक्र और मोक्ष प्राप्ति के मार्ग को विस्तार से समझाया गया है। भगवान यह भी स्पष्ट करते हैं कि निरंतर भक्ति और ध्यान के माध्यम से मनुष्य परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। अक्षर ब्रह्म योग व्यक्ति को जीवन के अंतिम सत्य और ईश्वर से जुड़ने का मार्ग दिखाता है।
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